भाषा को लेकर हम अक्सर बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कहते हैं, भाषा हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है, हमारी विरासत है। १४ सितंबर यानी हिंदी दिवस आते ही ऐसे अनेक वाक्य सुनाई देने लगते हैं। कुछ क्षणों के लिए लगता है जैसे हम सबको अपनी भाषा की बहुत चिंता है। फिर हिंदी दिवस बीत जाता है और हम अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में लौट जाते हैं, जहाँ भाषा भी हमारे जीवन की तरह कई हिस्सों में बँटी हुई है।
कहीं हिंदी है, कहीं अंग्रेज़ी, कहीं दोनों का मेल और कहीं किसी दूसरी भाषा की सहज उपस्थिति।
शायद भाषा का स्वभाव ही ऐसा है। वह किसी अलमारी में रखी हुई चीज़ नहीं है जिसे साल में एक दिन निकालकर साफ़ किया जाए और फिर वापस रख दिया जाए। भाषा तो हमारे साथ चलती है। हम जिस तरह बदलते हैं, वह भी बदलती है। हमारे शहर बदलते हैं, हमारे काम बदलते हैं, हमारे रिश्ते और परिवेश बदलते हैं और उनके साथ हमारी भाषा भी अपने भीतर नए शब्दों के लिए जगह बनाती जाती है।
हिंदी मेरे लिए शायद ऐसी ही भाषा है। मैं हिंदी में लिखती हूँ। यह कहना जितना सरल है, उसके पीछे उतना ही गहरा अनुभव छिपा है। जब कोई भाव मन में आता है तो कई बार उसके लिए शब्द किसी दूसरी भाषा में भी मिल सकते हैं, लेकिन मन के भीतर जो पहला वाक्य बनता है, वह अक्सर हिंदी में ही होता है।
खुशी हो तो कोई बहुत साधारण-सा शब्द भीतर से निकलता है जैसे, “यह कितना अच्छा है।”
दुःख हो तो शायद कोई व्याकरण याद नहीं आता, बस मन कहता है जैसे, “आज मन ठीक नहीं है।”
और कभी किसी बहुत पुराने दृश्य की याद अचानक सामने आ जाए तो भाषा अपने आप बदल जाती है। हम आधुनिक, व्यस्त और दुनिया भर की भाषाओं से घिरे हुए लोग उस एक क्षण में फिर से अपने भीतर के उस संसार में लौट जाते हैं जहाँ कुछ शब्द आज भी वैसे ही रखे हैं, जैसे बचपन में थे।
यही तो मातृभाषा की सबसे बड़ी खूबसूरती है। वह हमारे शब्दों के साथ साथ हमारी स्मृतियाँ भी सँभालती है। हमारे जीवन में भाषाएँ बढ़ सकती हैं, लेकिन पहली भाषा का एक अपना कोना बना रहता है। ऐसा कोना जहाँ पहुँचने के लिए किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती।
आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ अंग्रेज़ी का महत्व नकारा नहीं जा सकता। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और दुनिया से जुड़ने के अनेक रास्ते अंग्रेज़ी के माध्यम से खुलते हैं। दूसरी भाषाएँ सीखना भी हमारे लिए आवश्यक है। मैं तो यह मानती हूँ कि जितनी अधिक भाषाएँ हम सीखते हैं, दुनिया उतनी ही बड़ी दिखाई देती है। लेकिन दूसरी भाषा सीखने का अर्थ अपनी भाषा को भूल जाना क्यों हो?
यह सवाल मुझे अक्सर परेशान करता है।
कभी-कभी हम आधुनिक होने की कोशिश में अपनी ही भाषा से थोड़ा संकोच करने लगते हैं। हिंदी बोलते हुए लगता है कि कहीं हम कम ‘अपडेटेड’ न लगें। बातचीत में अंग्रेज़ी के कुछ शब्द सहजता से आ जाते हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। भाषाएँ एक-दूसरे से मिलती हैं, नए शब्द अपनाती हैं और इसी तरह जीवित रहती हैं।
समस्या शब्दों के मिलने में नहीं है।
समस्या तब है जब हमें अपनी भाषा बोलने में ही झिझक होने लगे।
मैंने हमेशा महसूस किया है कि हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता है। यह भाषा बहुत दूर तक जाती है। इसमें कबीर हैं, तुलसीदास हैं, प्रेमचंद हैं, महादेवी वर्मा हैं, निराला हैं, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं और आज के असंख्य लेखक और कवि भी हैं। इसमें गाँव की बोली की मिट्टी भी है और शहर की तेज़ रफ़्तार भी। इसमें शास्त्रीयता है तो रोज़मर्रा की बातचीत की बिल्कुल साधारण गर्माहट भी।
इसी कारण हिंदी को केवल एक ‘भाषा’ की तरह देखना उसके साथ न्याय नहीं है।
हिंदी एक बहती हुई नदी की तरह है। इसमें अनेक बोलियाँ आकर मिलती हैं। संस्कृत से आए शब्द हैं, उर्दू के शब्द हैं, फ़ारसी और अरबी से आए शब्द हैं, अंग्रेज़ी से आए शब्द भी हैं। समय के साथ इसमें नए शब्द आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे।
किसी भाषा को जीवित रखने का अर्थ उसे बिल्कुल वैसा ही बनाए रखना नहीं होता।
जीवित भाषा वही है जो समय के साथ साँस ले सके।
आज डिजिटल दुनिया ने हिंदी के लिए एक नया रास्ता खोला है। मोबाइल के छोटे-से पर्दे पर लोग हिंदी लिख रहे हैं, पढ़ रहे हैं, कविताएँ साझा कर रहे हैं, कहानियाँ सुन रहे हैं। सोशल मीडिया ने उन लोगों को भी लिखने और पढ़ने का अवसर दिया है जो शायद कभी किसी पत्रिका के संपादकीय कार्यालय तक नहीं पहुँच सकते थे।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है।
हाँ, इस दुनिया में भाषा की शुद्धता को लेकर बहस होती है। वर्तनी की गलतियाँ होती हैं। हिंदी और अंग्रेज़ी मिलती हैं। कभी-कभी एक ही वाक्य में तीन भाषाएँ आ जाती हैं। लेकिन शायद हमें हर बार भाषा को कटघरे में खड़ा करने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि इतने बदलावों के बावजूद लोग लिख तो रहे हैं, पढ़ तो रहे हैं, अपनी बात कह तो रहे हैं।
भाषा का भविष्य केवल शब्दकोश तय नहीं करते। उसे बोलने और लिखने वाले लोग तय करते हैं।
मुझे लगता है कि हिंदी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह अंग्रेज़ी से पीछे है या आगे। असली चुनौती यह है कि क्या हम अपने बच्चों के भीतर हिंदी के लिए वह सहजता बचा पा रहे हैं, जिसमें वे बिना किसी संकोच के अपने मन की बात हिंदी में कह सकें।
मैं मानती हूँ कि उन्हें हिंदी पढ़ाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें हिंदी में जीते हुए देखना ज़रूरी है।
घर में कभी कोई कहानी हिंदी में सुनाना, दादी-नानी की कोई पुरानी बात उसी भाषा में दोहराना, किसी कविता की पंक्ति पर ठहरना, किसी बच्चे के लिखे दो टेढ़े-मेढ़े वाक्यों को ध्यान से पढ़ना। ये छोटी-छोटी बातें भाषा को जीवित रखती हैं।
भाषा केवल पाठ्यक्रम से नहीं आती। वह वातावरण से आती है और इसी कारण हिंदी दिवस मुझे केवल उत्सव का दिन नहीं लगता। यह थोड़ा रुककर अपने आप से पूछने का दिन भी लगता है कि मेरी भाषा मेरे जीवन में कहाँ है?
क्या वह केवल मेरी किताबों में है? क्या वह केवल कविता लिखते समय मेरे पास आती है? या फिर वह मेरी रोज़मर्रा की हँसी, मेरी नाराज़गी, मेरी स्मृतियों और मेरे सपनों में भी मौजूद है?
विदेश में रहने वाले लोगों के लिए भाषा का यह प्रश्न शायद और गहरा हो जाता है। अपने देश से दूर रहते हुए जब किसी सार्वजनिक जगह पर अचानक हिंदी सुनाई देती है तो कान जैसे एक पल के लिए ठहर जाते हैं। सामने वाला अनजान व्यक्ति होता है, फिर भी उसकी भाषा कुछ परिचित-सा रिश्ता बना देती है।
एक ‘नमस्ते’ कभी-कभी बहुत दूर की दूरी कम कर देता है। एक ‘कैसे हैं आप?’ में भी अपनेपन की ऐसी ध्वनि होती है जिसे किसी शब्दकोश में नहीं समझाया जा सकता।
तब महसूस होता है कि भाषा मात्र संवाद का माध्यम नहीं, संबंध बनाने का माध्यम भी है और शायद इसी वजह से मैं हिंदी में लिखती हूँ। क्योंकि कुछ भाव ऐसे हैं जिन्हें मैं किसी दूसरी भाषा में कह तो सकती हूँ, लेकिन हिंदी में लिखते हुए वे मेरे अधिक अपने लगते हैं।
लेखन मेरे लिए केवल शब्दों को पन्ने पर उतारना नहीं है। यह अपने भीतर की आवाज़ को सुनना भी है। जब कोई वाक्य सही जगह बैठ जाता है तो भीतर एक छोटी-सी संतुष्टि होती है। लगता है… हाँ, मैं जो कहना चाहती थी, वह अब ठीक से कह पाई हूँ।
हर लेखक का अपनी भाषा से रिश्ता कुछ ऐसा ही होता है। कभी बहुत निकट, कभी रूठा हुआ, कभी सवालों से भरा हुआ और कभी इतना सहज कि उसके बारे में सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती।
हिंदी दिवस पर मुझे हिंदी के भविष्य की चिंता करने से अधिक उसके वर्तमान को महसूस करना अच्छा लगता है। क्योंकि हिंदी हमारे आसपास है। किसी माँ की आवाज़ में है। किसी बच्चे की पहली कविता में है। किसी पुराने पत्र में है। किसी प्रेम-पत्र के अधूरे वाक्य में है। किसी कहानी की आख़िरी पंक्ति में है।
इसलिए हिंदी को बचाने की बात करते हुए मुझे लगता है कि हमें उसे किसी संग्रहालय में सुरक्षित रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उसे बोलना होगा, लिखना होगा, पढ़ना होगा, नए शब्द देने होंगे, उससे सवाल करने होंगे और सबसे ज़रूरी, उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखना होगा।
भाषा तब तक जीवित रहती है जब तक कोई उसे अपने मन की बात कहने के लिए चुनता रहता है और मेरे लिए, कितनी भी भाषाएँ जीवन में आती-जाती रहें, कितनी भी दूरियाँ क्यों न हों, कितने ही नए शब्द क्यों न जुड़ जाएँ, मन जब बिल्कुल अपने आप से बात करता है, तो आज भी सबसे पहले हिंदी में ही बोलता है। इसीलिए हिंदी मेरी ज़ुबान की नहीं, मेरे मन की भाषा है।
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
जय हिंदी!
रश्मि त्रिवेदी
(हिंदी कवयित्री एवं लेखिका)



